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माँ : विश्व माँ दिवस पर विशेष – जिनकी माँ हैं – जिनकी माँ नहीं हैं जरूर पढ़ें -अत्यंत मार्मिक व हृदयस्पर्शी..

pawarmatrimonial mothers day

विश्व माँ दिवस पर विशेष (मई का द्वितीय रविवार)-
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जिनकी माँ हैं/जिनकी माँ नहीं हैं जरूर पढ़ें -अत्यंत मार्मिक व हृदयस्पर्शी-
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माँ रिश्तों को कथड़ी की तरह सिलती है,एक-एक टुकड़े को जोड़ती है –
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माँ सुई धागे की परंपरा को आगे बढाती है-
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कहते है ,माँ को जब ठण्ड लगती है तो वह अपने बच्चों को स्वेटर पहनाती है। जब घर में मिठाई के चार पीस हो और खाने वाले पांच तो सबसे पहले मिठाई खाने का आज मन नहीं कहने वाली माँ होती है। और लो और लो कहकर और प्यार से भोजन परोसकर अपने बच्चों को खिलाने वाली माँ होती है।

इतना प्यार इतना स्नेह जिंदगी में फिर कभी भोजन करते नहीं मिलता। माँ के हाथ की रोटी और चटनी में जो स्वाद होता है वैसा स्वाद फिर कभी चखने को नहीं मिलता और वह स्वाद भुलाये नहीं भूलता। माँ के हाथ की बासी रोटी भी छप्पन भोग सा स्वाद देती है।


माँ रिश्तों को कथड़ी की तरह सिलती है। माँ एक-एक टुकड़े को जोड़ती है। माँ छोटे,बड़े,कमजोर,मजबूत सब तरह के टुकड़ों का उपयोग करती है। माँ की नज़र में सब उपयोगी है। और माँ उन सबका उपयोग करना भी जानती है। सुई दो को एक करती है ,कैची एक को दो कर देती है। माँ सुई धागे की परंपरा को अपनाती और आगे बढाती है।माँ लुगड़ा डांडया करती है। कमजोर को चलाने के लिए उसकी जगह मजबूत को प्रदान करती है ताकि कमजोर भी सम्मान के साथ जी सके। वह कमजोर को अपनी जिंदगी से खारिज नहीं करती।


माँ का पूरा जीवन दर्शन कथड़ी में समाया हुआ है। कथड़ी ही माँ की पूंजी होती है। बेटी को ससुराल विदा करते समय माँ अपनी एकमात्र पूंजी कथड़ी ही तो बेटी को सौंपती है। बेटे जब अलग अलग होते हैं तब भी माँ सब बेटों के साथ रहने का प्रबंध कर लेती है। वह अपनी गोद और अपने आँचल की छाँव भले ही सब बच्चों को मुहैया न करा पाए पर वह कथड़ी के रुप में हर बेटे को अपनी गोद जैसा अहसास कराने में सफल होती है। और बेटे भी कथड़ी ओड़-बिछाकर माँ की उपस्थिति महसूस करते है। माँ अपनी संतान में जीती है। माँ परदेश से आये अपने बेटे के मुँह को देखकर ही उसके सुखी या दुखी होने का अहसास कर लेती है।


माँ केवल और केवल कथड़ी में जीती है। माँ द्वारा सिली हुई कथड़ी परस्पर एक दूसरे से जुड़े होने का अहसास कराती है और एक दूसरे से जुड़े रहने का सन्देश देती है। एक एक टुकड़ा भी जुड़कर ठण्ड का सामना करने में मदद करता है। टुकड़ा जुड़कर ही कथड़ी बनता है ,सम्पूर्णता पाता है। जुड़े रहकर ही किसी के काम आया जा सकता है। जुड़ने से घर परिवार और समाज के छोटे और कमजोर सदस्य भी अपना अधिकतम देने लायक बन पाते हैं। बड़ों और बहादुरों के सहारे छोटे और कमजोर सदस्य अपना जीवन सार्थक कर पाते हैं। माँ कथड़ी के माध्यम से यह सन्देश भी देती है किसी पर आश्रित मत रहो। गद्दे, रजाई न सही पर हम अपने लिए कथड़ी की व्यवस्था तो कर ही सकते है।


माँ द्वारा बेटी को दी गई कथड़ी केवल कपड़ों का पुंज मात्र नहीं होती। माँ कथड़ी के माध्यम से अपनी बेटी को जीवन का सच्चा और सार्थक सबक सिखाती है। ससुराल में सबकुछ जुड़ा हुआ रहे। कुछ भी बिखरे नहीं ,कुछ भी टूटे नहीं। यदि कभी कोई बिखरे भी ,टूटे भी तो भी उन्हें जोड़कर रखे जाने के प्रयास किये जाए। जुड़े रहने से ही जीवन सुरक्षित रहता है और सम्पूर्णता तथा सार्थकता पाता है। छोटा,अनुपयोगी या निरर्थक जैसा कुछ भी नहीं होता। ईश्वर द्वारा सृजित हर चीज अमूल्य है और उसका किसी न किसी उद्देश्य से सृजन हुआ है। माँ की यह शिक्षा और माँ का यह संस्कार बेटी को घर से दूर ससुराल में भी जीने का आधार प्रदान करता है।

माँ इस कथड़ी के रुप में ससुराल में भी अपनी बेटी का सम्बल और सहारा बनती हैतथा अपनी ममता का अहसास कराती रहती है। माँ का अपनी संतान से जुड़ाव इतना जबर्दस्त होता है कि ससुराल में रहकर भी बेटी माँ के गांव से आने वाले हर शख्स को पहचान लेती है। यहाँ तक कि बेटी मायके से आये कुत्ते को भी पहचान लेती है और उसे देखकर कुछ देर ही सही पर अपने को अपने मायके में होने के सुख से सराबोर कर लेती है। माँ द्वारा बेटी के लिए भेजी गई रोटी ससुराल वाले खाते हैं पर बेटी अपने ससुराल वालों को माँ के हाथ की रोटी खाता देख खुश हो लेती है और रोटी के पल्लू में चिपके टुकड़ों को खाकर ही तृप्त हो लेती है जैसे भगवान् कृष्ण द्रौपदी के अक्षय पात्र में चिपके चावल के एक दाने को खाकर तृप्त हो लेते हैं।बेटी ससुराल में भी माँ के हाथ की रोटी के लिए तरसती रहती है।

माँ तभी अपनी बेटी के लिए राखी और नागपंचमी पर रोटी भेजती है। बेटी जब भी मायके से ससुराल जाती है तब भी माँ कभी बेटी को खाली हाथ विदा नहीं करती। वह अपने हाथ से बनी रोटी बेटी के लिए बांधती है ताकि माँ के हाथ की रोटी का स्वाद और अपनी माँ की याद उसे बनी रहे। माँ अपनी बेटी ने मन में सदैव जिन्दा रहना चाहती है क्योंकि माँ ही बेटी का एकमात्र सम्बल होती है। और बेटी भी माँ की यादों के सहारे अपने ससुराल के दुःख दर्दों को भुलाकर अपनी जिंदगी जीने की राह चुनती है।


माँ जब इस संसार से विदा होती है तो सबसे ज्यादा दुःख बेटी को होता है।माँ के जाते ही बेटी को अपने मायके जाने का रास्ता बंद होने का अज्ञात भय सताने लगता है। मायके से ससुराल खाली हाथ लौटने के विचार से ही बेटी की रूह काँप जाती है। और माँ की तेरहवीं में शामिल बेटी पहली बार मायके से ससुराल खाली हाथ लौटती हैतथा अपने साथ माँ की यादों का पहाड़ लेकर ससुराल पहुँचती है। ससुराल से मायके आने में बेटी को रास्ते का सफर भी थकाता नहीं पर आज बेटी उसी रास्ते लौटते थक जाती है और बुरी तरह टूट जाती है। बार बार उसका मन पीछे मुड़ मुड़ कर देखता है शायद माँ की एक झलक मिल जाए। बेटी रोटी है रास्ते भर। और उसका रोना सुनकर रोते हैं रास्ते के सभी पेड़ पौधे ,ढोर जानवर ,खेत खलिहान ,नदी नाले। मानों बेटी के साथ पूरी प्रकृति रो रही हो।

बेटी अपना दुःख रास्ते में ही रोकर हल्का कर देना चाहती है क्योंकि वह जानती है उसका दुःख हल्का करने वाली माँ अब इस संसार में नहीं है। उसका रोना सुनकर रोने वाली माँ अब इस संसार में नहीं है। उसके आँसू पोंछकर अपनी छाती से लगाने वाली माँ अब इस संसार में नहीं है। उसका चेहरा देखकर दुबली और कमजोर हो गई है कहने वाली माँ अब इस संसार में नहीं है। उसके लिए गुड़ और नारियल गोला भेजने वाली माँ अब इस संसार में नहीं है। बेटी का सन्देश सुनकर भाई को अपनी बहन को लाने भेजने वाली माँ अब इस संसार में नहीं है। और हर आने जाने वाले से बेटी का सुखवाड़ा पूछने वाली माँ अब इस संसार में नहीं है।


वल्लभ डोंगरे ,सुखवाड़ा ,सतपुड़ा संस्कृति संस्थान ,भोपाल।

 

Happy Mothers Day #pawarmatrimonial

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